चक्रा साउंड ध्‍यान–(कैसे करे)

ओशो चक्रा साउंड ध्‍यान—

भारतीय अध्‍यात्‍म जगत में जो भी खोज हुई है। वह अमुल्‍य है। ध्‍यानियों ने अपने अंतस में उतर कर संगीत, नृत्‍य, योग, और आर्युवेद, मुर्ति कला जाना है। जिसने हमारे जीवन के खजानें को इतना उन्‍नत और खुसहाल कर दिया था। इस तरह भारत ने संगीत की उन उच्‍चाईयों को जाना जिससे….ठाठ और राग निर्मित हुए। प्रत्‍येक राग का एक टाईम है…..उस किन—किन सुरों के साथ कितने समय पर गायन करना है।

यदि प्रकृति की दृष्‍टि से देखो तो इंद्रधनुष के साथ रंग दिखाई देंगे। इनमें लाल रंग पहला और बैंगनी रंग अंतिम होगा। बैंगनी रंग के बाद पून: यही क्रम दिखाई देगा। यह बात सोचने की है पढना जारी रखे

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कहे होत अधीर–(प्रवचन–07)

साहिब से परदा न कीजै—(प्रवचन—सातवां)

 सारसूत्र :

 

बनत बनत बनि जाई, पड़ा रहै संत के द्वारे।।

तन मन धन सब अरपन कै कै, धका धनी के खाय।

मुरदा होय टरै नहिं टारै, लाख कहै समुझाय।

स्वान-बिरति पावै सोई खावै, रहै चरन लौ लाय।

पलटूदास काम बनि जावै, इतने पर ठहराय।। पढना जारी रखे

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कोपलें फिर फूट आईं–(प्रवचन–12)

कोंपलें फिर फूट आई शाख पर—(प्रवचन—बारहवां)

     दिनांक: 15 अगस्त, 1986, 

सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्‍नसार—

      1—इस देश में ध्‍यान को गौरी शंकर की ऊँचाई मिली। शिव, पतंजलि,महावीर, बुद्ध, गोरख जैसी अप्रतिम प्रतिभाएं साकार हुई। फिर भी किस कारण से ध्‍यान को प्रति आकर्षण कम होता गया?

      2—उस दिन आपने कहा कि मैं अराजकवादी हूं, अनार्किस्‍ट हूं। इसे स्‍पष्‍ट करने की कृपा करे।

      अपराध,दंड ओर अपाराध—भाव की समस्‍याएं समय ओर स्‍थान के भेद से बदलती रहती है। लेकिन वे किसी ने किसी रूप में सदा ओर सर्वत्र मनुष्य का पीछा करती है। क्‍या इन पर प्रकाश डालने की अनुकंपा करेंगे? पढना जारी रखे

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कहे होत अधीर–(प्रवचन–06)

क्रांति की आधारशिलाएं—(प्रवचन—छठवां)

प्रश्न-सार:

1—मेरा खयाल है कि आपके विचारों में, आपके दर्शन में वह सामर्थ्य है, जो इस देश को उसकी प्राचीन जड़ता और रूढ़ि से मुक्त करा कर उसे प्रगति के पथ पर आरूढ़ करा सकती है। लेकिन कठिनाई यह है कि यहां के बुद्धिवादी और पत्रकार आपको अछूत मानते हैं और आपके विचारों को व्यर्थ प्रलाप बताते हैं। इससे बड़ी निराशा होती है। कृपा कर मार्गदर्शन करें।

 2—आप तो कहते हैं, हंसा तो मोती चुगै। लेकिन आज तो बात ही दूसरी है। आज का वक्त तो कहता है: हंस चुनेगा दाना घुन का, कौआ मोती खाएगा। और इसका साक्षात प्रमाण है तथाकथित पंडित-पुरोहितों को मिलने वाला आदर-सम्मान और आप जैसे मनीषी को मिलने वाली गालियां। पढना जारी रखे

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कोपलें फिर फूट अाई–(प्रवचन–11)

प्रेम का जादू सिर चढ़कर बोले—( प्रवचन—ग्यारहवां)

दिनांक: 9 अगस्त, 1986,

  1. 00 संध्या, सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्‍नसार:

1— भगवान, हमें जो आपमें दिखाई पड़ता है, वह दूसरों को दिखाई नहीं पड़ता। ऐसा क्यों है भगवान? क्या जन्मों-जन्मों में ऐसा कुछ अर्जन करना होता है?

2—आपसे मैं मोहब्‍बत करती हूं। मेरी भौतिक देह ही सिर्फ पुरूष की है, बाकी तो मैं ह्रदय से मन आपकी प्रेमिका हूं। मेरे संन्‍यासी मित्र मुझ पर दबाव डालते है कि मैं लडकी से शादी कर लूं। मैं उसे कैसे समझाऊं की एक स्‍त्री दूसरी स्‍त्री से कैसे शादी कर सकती है?

3—अभिमान ओर स्‍वाभिमान में क्‍या भिन्‍नता है?

4—सन् 1971 में पहली बार आपको देखा ओर आपका प्रवचन सुना था, तब से आपके प्रेम में हूं, दुर्भाग्‍यवश मेरे परिवार ओर रिश्‍तेदारो में एक भी व्‍यक्‍ति आपमें रूचि नही रखता।……क्‍या यह विरोध समाप्‍त होगा? या कि यह मेरे पूरे जीवन जारी रहेगा? पढना जारी रखे

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कोपलें फिर फूट आई–(प्रवचन–10)

वर्तमान संस्कृति का कैंसर: महत्वाकांक्षा—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक : 8 अगस्त, 1986,

  1. 00 संध्या, सुमिला, जुहू, बंबई।

प्रश्‍नसार:

1— भगवान, आज सारी दुनिया में आतंकवाद (टेरेरिज्म) छाया हुआ है। मनुष्य की इस रुग्णता और विक्षिप्तता का मूल स्रोत क्या है? यह कैसे निर्मित हुआ? इसका निदान और इसकी चिकित्सा क्या है? क्या आशा की जा सकती है, कि कभी मनुष्यता आतंकवाद से मुक्त हो सकेगी?

2—मेरा मार्ग क्‍या है? बताने की अनुकंपा करें।

3—क्‍या इस यात्रा का कोई अंत नहीं है?

4—बुद्ध को तो उनके महापरिनिर्वाण के बाद भारत ने विदा किया ओरविश्‍व ने अपनाया। आपकोदुनया भर से निष्‍कासित किया गया, जब कि विश्‍व शिक्षित हो चुका है। यह सब से बड़े दुख की बात है।………

5—आपने विश्‍व भर में इतने संन्‍यासियों को असीम प्रेम किया है उसका कोई ऋण चुका सकता नहीं।फिर भी कितने ऐसे संन्‍यासी है जो आपकी कृपा के बहुत नजदीक थे, तब भी वह ही अब जुदास की तरह आपसे वर्तव कर रहे है। जुदास की यह परंपरा क्‍या कभी बंद न होगी? ओर उनका क्‍या राज है? पढना जारी रखे

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कहे होत अधीर–(प्रवचन–05)

बैराग कठिन है—(प्रवचन—पांचवां)

 सारसूत्र :

 जनि कोई होवै बैरागी हो, बैराग कठिन है।।

जग की आसा करै न कबहूं, पानी पिवै न मांगी हो।

भूख पियास छुटै जब निंद्रा, जियत मरै तन त्यागी हो।।

जाके धर पर सीस न होवै, रहै प्रेम-लौ लागी।

पलटूदास बैराग कठिन है, दाग दाग पर दागी हो।।

 

अब तो मैं बैराग भरी, सोवत से मैं जागि परी।।

नैन बने गिरि के झरना ज्यों, मुख से निकरै हरी-हरी।

अभरन तोरी बसन धै फारौं, पापी जिव नहिं जात मरी।।

लेउं उसास सीस दै मारौं, अगिनि बिना मैं जाऊं जरी।

नागिनि बिरह डसत है मोको, जात न मोसे धीर धरी।।

सतगुरु आई किहिन बैदाई, सिर पर जादू तुरत करी।

पलटूदास दिया उन मोको, नाम सजीवन मूल जरी।। पढना जारी रखे

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कोपले फिर फूट आईं–(प्रवचन–09)

ध्यान तंत्र के बिना लोकतंत्र असंभव—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक :

7 अगस्त, 1986, 7. 00 संध्या,

सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्‍नसार—

1—भगवान, विचार अभिव्यक्ति और वाणी-स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल आधार है। आपकी बातों से कोई सहमत हो या अपना विरोध प्रकट करे, इसके लिए वह स्वतंत्र है। लोग विरोध तो करते हैं, लेकिन व्यक्ति को अपना काम करने की स्वतंत्रता नहीं देना चाहते। ऐसा क्यों?

2—आपको ऐसा करना चाहिए और वैसा नहीं करना चहिए, यह ठीक है और वह गलत है, ऐसी चर्चा अक्‍सर हमआपके प्रेमी किया करते है। ऐसी चर्चाओं से ऐसा लगता है, जैसे हम आपसे ज्‍यादा जानते है ओर आपसे ज्‍यादा समझदार है।

3—तेरह वर्ष पहले आपने मुझे संन्‍यासी बना कर नया जीवन दिया। इस पूरे समय में आपने बहुत दिया।पूरा जीवन बदल गया। फिरभी प्‍यास बढ़ती जा रही है। आपके निकट रहने का भाव तीव्र होता जा रहा है। अब क्‍या करू? इस विरह में धैर्य रख सकूं, इसके लिए आप ही शक्‍ति देना। पढना जारी रखे

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कहे होत अधीर–(प्रवचन–04)

मौलिक धर्म—(प्रवचन—चौथा)

 प्रश्न-सार :

 1—बुनियादी रूप से आप धर्म के प्रस्तोता हैं–वह भी मौलिक धर्म के। आप स्वयं धर्म ही मालूम पड़ते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात है कि अभी आपका सबसे ज्यादा विरोध धर्म-समाज ही कर रहा है! दो शंकराचार्यों के वक्तव्य उसके ताजा उदाहरण हैं। क्या इस पर कुछ प्रकाश डालने की कृपा करेंगे?

 2—मैं बुद्ध होकर मरना नहीं चाहती; मैं बुद्ध होकर जीना चाहती हूं।

 3—आप कहते हैं कि जीवन में कुछ मिलता नहीं। फिर भी जीवन से मोह छूटता क्यों नहीं? समझ में बात आती है और फिर भी समझ में नहीं आती; समझ में आते-जाते छूट जाती है, चूक जाती है। पढना जारी रखे

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कहे होत अधीर–(प्रवचन–03)

 साजन-देश को जाना—(प्रवचन—तीसरा)

सारसूत्र:

 जेकरे अंगने नौरंगिया, सो कैसे सोवै हो।

लहर-लहर बहु होय, सबद सुनि रोवै हो।।

जेकर पिय परदेस, नींद नहिं आवै हो।

चौंकि-चौंकि उठै जागि, सेज नहिं भावै हो।।

रैन-दिवस मारै बान, पपीहा बोलै हो।

पिय-पिय लावै सोर, सवति होई डोलै हो।।

बिरहिन रहै अकेल, सो कैसे कै जीवै हो।

जेकरे अमी कै चाह, जहर कस पीवै हो।।

अभरन देहु बहाय, बसन धै फारौ हो।

पिय बिन कौन सिंगार, सीस दै मारौ हो।।

भूख न लागै नींद, बिरह हिये करकै हो।

मांग सेंदुर मसि पोछ, नैन जल ढरकै हो।।

केकहैं करै सिंगार, सो काहि दिखावै हो।

जेकर पिय परदेस, सो काहि रिझावै हो।।

रहै चरन चित लाई, सोई धन आगर हो।

पलटूदास कै सबद, बिरह कै सागर हो।। पढना जारी रखे

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कोपले फिर फूट आई–(प्रवचन–08)

सदगुरु शिष्य की मृत्यु है—(प्रवचन—आठवां)

6 अगस्त, 1986, 7. 00 संध्या,

सुमिला जुहू, बंबई

प्रश्‍नसार:

1— भगवान, एक शिष्य ने सदगुरु से पूछा, मैं आपसे एक प्रश्न करूं? सदगुरु ने उत्तर दिया, व्हाई यू वांट टू वुण्ड यारेसेल्फ?

2—आपके स्‍वास्‍थ्‍य को देख कर बहुत चिंता होती है। आपने दुनिया को समझाने में अपनी आत्‍मा उंडेल रख दी, लेकिन लोग बदलने की बजाय आपको मिटा देना चाहित है। आप इतना श्रम क्‍यों कर रहे है?

3—क्‍या आपने अब संन्‍यास—दीक्षा देनी ओर शिष्‍य बनाना बंद कर दिया है? क्‍या मैं आपका शिष्‍य बनने से बंचित ही रह जाऊंगा?

4—आप कहते है कि जहां हो वहीं रहो, जो करते हो वही करो। फिर आप इधर—उधर क्‍यों भागते हैं? पढना जारी रखे

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कहे होत अधीर–(प्रवचन–02)

अमृत में प्रवेश—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 12 सितम्‍बर सन् 1979;

ओशो आश्रम पूना।

 प्रश्न-सार :

1—कोई तीस वर्ष पूर्व, जबलपुर में, किसी पंडित के मोक्ष आदि विषयों पर विवाद करने पर दद्दाजी ने कहा था कि शास्त्र और सिद्धांत की आप जानें, मैं तो अपनी जानता हूं कि यह मेरा अंतिम जन्म है।

एक और अवसर पर कार्यवश वे काशी गए थे। किसी मुनि के सत्संग में पहुंचे। दद्दाजी को अजनबी पा प्रवचन के बाद मुनि ने पूछा, आज से पूर्व आपको यहां नहीं देखा!

कहा, हां, मैं यहां का नहीं हूं।

पूछा, आप कहां से आए हैं और यहां से कहां जाएंगे?

कहा, निगोद से आया हूं और मोक्ष जाऊंगा।

पांच वर्ष पूर्व हृदय का दौरा पड़ने पर, मां को चिंतित पाकर उन्होंने कहा था, चिंता न लो। अभी पांच वर्ष मेरा जीवन शेष है।

उनकी इन उद्घोषणाओं के रहस्य पर प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

 2—संत रज्जब, सुंदरो और दादू की मृत्यु की कहानी मेरे लिए बड़ी ही रोमांचक रही। परंतु मेरे गुरु और हमारे प्यारे दादा, जो मेरे मित्र भी थे, उनकी मृत्यु के समय की आंखों देखी घटना का अनुभव मेरे लिए उससे भी कहीं अधिक रोमांचकारी हुआ। इससे मेरी आंखें मधुर आंसुओं से भर जाती हैं। पढना जारी रखे

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काहे होत अधीर–(प्रवचन–01)

पाती आई मोरे पीतम की—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 11 सितम्‍बर सन् 1979,

ओशो आश्रम पूना।

सूत्र:

पूरन ब्रह्म रहै घट में, सठ, तीरथ कानन खोजन जाई।

नैन दिए हरि—देखन को, पलटू सब में प्रभु देत दिखाई।।

कीट पतंग रहे परिपूरन, कहूं तिल एक न होत जुदा है।

ढूंढ़त अंध गरंथन में, लिखि कागद में कहूं राम लुका है।।

वृद्ध भए तन खासा, अब कब भजन करहुगे।।

बालापन बालक संग बीता, तरुन भए अभिमाना।

नखसिख सेती भई सफेदी, हरि का मरम न जाना।। पढना जारी रखे

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काहे होत अधीर–(संत पलटूदास)

काहे होत अधीर—(संत पलटूदास)

ओशो

ओशो द्वारा पूना में संत पलटूदास की वाणीपर दिए गये (11—09—1979 से 30—10—1979) उन्‍नीस अमृत प्रवचनों का संकलन।)

संतों का सारा संदेश इस एक छोटी सी बात में समा जाता है कि संसार सराय है। और जिसे यह बात समझ में आ गई कि संसार सराय है, फिर इस सराय को सजाने में, संवारने में, झगड़ने में, विवाद में, प्रतिस्पर्धा में, जलन में, ईष्या में, प्रतियोगिता में—नहीं उसका समय व्यय होगा। फिर सारी शक्ति तो पंख खोल कर उस अनंत यात्रा पर निकलने लगेगी, जहां शाश्वत घर है। पढना जारी रखे

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कोपलें फिर फूट आईं–(प्रवचन–07)

जीवित मंदिर मधुशाला है—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक : 5 अगस्त, 1976,

  1. 00 संध्या, सुमिला, जुहू, बंबई।

प्रश्‍नसार:

1—हाथ हटता ही नहीं दिल से, हम तुम्‍हें किस तरह सलाम करें?

2—बहुत सी मधुशालाएं देखीं, पीने वालों को नशो में धुत देखा। मगर आपकी मधुशाला का क्‍या कहना। न कभी देखी, न कभी सुनी। आपकी मधुशाला में पीने वालों को मस्‍त देखा।……….

3—प्रश्‍न उठते है और उनमें से बहुत से प्रश्‍नों के उत्‍तर भी आ जाते है। यह सब क्‍या है?

4—कल ही मैंने पहली बार आपका प्रवचन सुना। आपमें जो संगम मैंने देखा है, वैसा संगम शायद ही पृथ्‍वी पर कभी हो। मैंने ऐसा जाना कि शायद परमात्‍मा आपके द्वारा पहली बार हंस रहा है। पढना जारी रखे

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कोपलें फिर फूट आईं–(प्रवचन–06)

परम ऐश्वर्य: साक्षीभाव—(प्रवचन—छठवां)

 दिनांक: 4 अगस्त, 1986, 7. 00 संध्या,

सुमिला, जुहू, बंबई।

प्रश्‍नसार:

1— भगवान, अध्ययन, चिंतन और श्रवण से बुद्धिगत समझ तो मिल जाती है, लेकिन मेरा जीवन तो अचेतन तलघरों से उठने वाले आवेगों और धक्कों से पीड़ित और संचालित होता रहता है। मैं असहाय हूं, अचेतन तलघरों तक मेरी पहुंच नहीं। कोई विधि, कोई जीवन—शैली, सूत्र और दिशा देने कि कृपा करें।

2—आपने ईश्‍वर तक पहुंचने के दो मार्ग—प्रेम ओर ध्‍यान बताए है। मेरी स्‍थिति ऐसी है कि प्रेम—भाव मेरे ह्रदय में उमड़ता नहीं। ऐसा नहीं है कि मैं किसी को प्रेम नहीं करना चाहती। वे मेरे व्‍यक्‍तित्‍व का प्रकार नहीं है। चुप रहना और शांत बैठना मुझे अच्‍छा लगाता है। इस लिए मैंने ध्‍यान का मार्ग चुन कर साक्षी की साधना शुरू की। अब कठिनाई यह है कि जैसे ही मैं सजग होकर देख रही हूं कि मैं विचारों को देख रही हूं, तो विचार रूक जाते है। और क्षणिक आनंद का अनुभव होता है। फिर विचारों का तांता शुरू हो जाता है………..

3—ह्रदयको सभी संतो ने अध्‍यात्‍म का द्वार कहा है और मन को विचार और बुद्धि का। ह्रदय और मन में क्‍या फर्क है? ह्रदय और आत्‍मा में क्‍या फर्क है? इस फर्क को कैसे स्‍पष्‍ट करें? कैस पहचानें? पढना जारी रखे

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कोपलें फिर फूट आईं–(प्रवचन–05)

अपार्थिव तत्व की पहचान—(प्रवचन—पांचवां)

 दिनांक: 3 अगस्त, 1986,

  1. 30 अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्‍नसार:

1—जब कोई मुझसे छल और दगावाजी करता है या जब कोई मुझे वस्‍तु की तरह उपयोग करता है, ऐसी स्‍थिति में मुझे क्‍या करना चाहिए?

2—विपस्‍सना की साधना में कैथार्सिस कब होती है? मैं विपस्‍सना का अभ्‍यास करता हूं। मेरा संगीता का कार्यक्षेत्र होश की दिशा में मेरे लिए किस प्रकार सहायक हो सकता है?

3—दिन में अधिक समय ध्‍यान में डूबी, खोई रहती हूं। शरीर क्षीण हुआ है। कुछ समय पहले दलाई लामा के डाक्‍टर ने मेरा हाथ पकड़ कर किा कि मुझे अधिक पार्थिव होने की जरूरत है। कृपया बातएं कि मुझे क्‍या करना है? पढना जारी रखे

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कोपलें फिर फूट आईं–(प्रवचन–04)

अपने ज्ञान को ध्यान में बदलो—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक 3 अगस्त, 1986,

  1. 30 प्रातः सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्‍नसार:

1—परसों ही आपने कहा कि अपने को जाने बिना अर्थी नहीं उठने देना। यह चुनौती तीर की तरह हृदय में चुभ गयी। हम कैसे शुरू करें?

2—रजनीशपुरम कम्‍यून से लौट कर मैं बहुत अकेली, खोई—खोई सी, कन्‍फ्युज्‍ड अनुभव कर रही हूं।

3—क्‍या यह संभव है कि कोई व्‍यक्‍ति आपकी चेतना—दशा को उपलब्‍ध करके शरीररिक रूप से पूर्ण स्‍वस्‍थ रह सके? या कि यह संभव नहीं है, ऐसा ताओ का नियम है? पढना जारी रखे

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कोपलें फिर फूट आईं–(प्रवचन–03)

शून्‍य शिखर पर सुख की सेज—( प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 2 अगस्त, 1986,

  1. 30 अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई।

प्रश्‍नसार:

1—भगवान, वह कौन सी ऐसी अज्ञात शक्ति है, जो हमें आपकी तरफ खींच रही है?

2—बीस साल से आपके साथ रहते—रहते मेरा आमूल—परिवर्तन हो गया है। मैं जो पहले थी, वह अब नहीं हूं। शांति और सुख से भर गई हूं। आपकी अनुकंपा अपार है।

3—आज जीवंत फूल की महक, सुंदरता, निजीपन, फिर से जिंदगी खिल गई। प्‍लास्‍टिक के फूल कैसे भी हों, लेकिन सुवास नहीं।

4—अपने आपको कैसे समझूं? कुछ समझ नहीं आता और मृत्‍यु का ताक बहुत भय लगता है।

5—आपको महसूस कर दिल पर एक मीठी चुभन सी महसूस करती हूं। आप द्वारा प्रेम—वर्षा मुझे आप से बाहर कर देती है। पढना जारी रखे

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कोपले फिर फूट आईंं–(प्रवचन–01)

आत्‍मा की अग्‍नि—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 31 जुलाई, 1986,

  1. 30 अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई।

प्रश्‍नसार:

1— भगवान, आप कैसे हैं?

2—मुझे मार्ग दीजिए!

3—यह पूछना है, आपने अभी कहा कि हम नासमझ है। आप हमें ऐसा क्‍यों नहीं कहते कि तुम नासमझ हो?…..आप कहते है हम नासमझ है…..।

4—आप कहते है कि पूरब में ही धर्म फलित होता है।….

5—इस देश में बहुत से झूठे धर्म पैदा हो रहे है, जिनमें अधर्म फैल रहा है। ऐसे समय में हमारा क्‍या कर्तव्‍य है? कृपया मार्गदर्शन दे। पढना जारी रखे

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प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–10)

वह गाता है, नाचता है और आंसू बहाता है—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 30 जून सन्1976;

श्री ओशो आश्रम पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

प्यारे ओशो! बाउलों को किसने जन्म दिया? उनकी शुरुआत कब कैसे हुई?

कृपया स्पष्ट करने की अनुकम्पा करें।

बाउल जैसे लोगों को किसी ने जन्म नहीं दिया। बाउलों जैसे धर्म, धर्म से अधिक घटनाएं हैं। गुलाबों को किसने उत्पन्न किया? उन गीतों को किसने रचा, जो पक्षी हर सुबह गुनगुनाते हैं? नहीं, हमें ऐसे प्रश्न कभी पूछने ही नहीं चाहिए। ऐसा यहां हमेशा ही होता है। पढना जारी रखे

बाऊल गीत-1--प्रेम योग--(ओशो) में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , ,

कोपलें फिर फूट आईं–(प्रश्‍न–चर्चा्)

कोपलें फिर फूट आईं—(प्रश्‍न—चर्चा)

ओशो

(ओशो द्वारा दिए गए बारह प्रवचनों का अप्रितम संकलन)

 प्रवेश के पूर्व:

तुमने पूछा है: मैं कैसे अपने अचेतने, अपने अंधरे को प्रकाश से भर दूं?

एक छोटा सा काम करना पड़ेगा। बहुत छोटा सा काम।

चौबीस घंटे तुम दूसरे को देखने में लगे हो—दिन में भी और रात में भी। कम से कम कुछ समय दूसरे को भूलने में लगो। जिस दिन तुम दूसरे को बिलकुल भूल जाओगे, बुद्धि की उपयोगिता नष्‍टा हो जाएगी।

इसे ज्ञानियों ने ध्‍यान कहा है। ध्‍यान का अर्थ है: एक ऐसी अवस्‍था,जब जानने को कुछ भी नहीं बचा। सिर्फ जानने वाला ही बचा। उससे छुटकारे का कोई उपाय नहीं है। लाख भागो पहाड़ों पर और रेगिस्‍तानों में, चाँद—तारों पर,लेकिन तुम्‍हारा जानने वाला तुम्‍हारे साथ होगा। चूंकि वह तुम हो, वह तुम्‍हारी आस्‍तित्‍व है। रोज घडी भर, कभी भी सुबह या सांझ या दोपहर, इस अनूठे आयाम को देना शुरू कर दो। बस आँख बंद करे बैठ जाओ, ……. पढना जारी रखे

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प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–09)

दो वृक्षों के जोड़े से उत्‍पन्‍न हुआ फल—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 29 जून; सन् 1976

श्री ओशो आश्रम पूना।

बाउलगीत:

जो व्यक्ति प्रेम के अनुभव से अनजाना है

उसके साथ सम्बंध जोड़कर तुम कैसे किसी निष्कर्ष परपहुंच सकते हो?

उल्लू सूर्य की किरणों से अंधा बना

बैठा हुआ आकाश को एकटक देखता रहता है।

नुष्य एक अनवरत खोज है, एक शाश्वत तलाश है, और निरंतर बना रहने वाला एक प्रश्न है। यह खोज है उस ऊर्जा के लिए जो पूरे अस्तित्व को संभाले हुए है चाहे तुम उसे परमात्मा कहो, सत्य कहो, अथवा चाहे जिस नाम से पुकारो। कौन एक साथ इस अनंत अस्तित्व को धारण किए हुए है? इस सभी का केंद्र और इसका सबसे महत्त्वपूर्ण भाग कौन है? पढना जारी रखे

बाऊल गीत-1--प्रेम योग--(ओशो) में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , | 1 टिप्पणी

सहज योग–(प्रवचन–20)

हे कमल, पंक से उठो, उठो—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 10 दिसंबर, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—आपकी हत्या की धमकियां दी जा रही हैं । यह मुझसे न सुना जाता है और न सहा जाता है।

 2—मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम

ऐ मेरे ख्वाब की ताबीर मेरी जाने-गज़ल

जिन्दगी मेरी तुझे याद किये जाती है।

 3—आपने कहा कि सदगुरु शिष्य को संपूर्ण स्वतंत्रता देता है। इसका तो अर्थ हुआ कि वह शिष्य की जरा भी चिंता नहीं करता! पढना जारी रखे

सहज योग--(सरहपा--तिलोपा) अेाशो में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , ,

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–08)

तुम स्‍वयं धुलकर तरल हो जाओ—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 28 जून सन् 1976;

श्री ओशो आश्रम पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

प्यारे ओशो! बाउल अपनी देह में जीते हुए ही उत्सव आनंद मनाते हैं। इस सम्बंध में क्या आप कुछ और अधिक बता सकते हैं?

अमेरिकन भी अपने शरीर को सुस्वाद्व और सुंदर भोजन से, राल्फिंग और मालिश आदि से स्वस्थ रखकर जीवन का आनंद लेते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचती कि यह बाउलों जैसा ही है। क्या आप इस पर हमें कुछ बोध देने की कृपा करेगे? पढना जारी रखे

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सहज योग–(प्रवचन–19)

प्रेम प्रार्थना है—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

दिनांक 9 दिसंबर, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1–कुछ लोग आपके आश्रम की तुलना जोन्सटाउन से करते हैं। जिस भांति गुयाना के जंगल में सामूहिक आत्मघात हुआ, वैसा ही कुछ क्या यहां होने की संभावना है?

 2—क्या आप समझाने की कृपा करेंगे कि आपकी शिक्षा और प्रयोगों में और संप्रदाय में क्या अंतर है?

 3—मैं बिलकुल पत्थर हूं और फिर भी प्रार्थना में डूबना चाहता हूं, पर जानता नहीं कि प्रार्थना क्या है? मुझ अंधे को भी आंखें दें।

 4—विवाहित जीवन के संबंध में आपके क्या खयाल हैं? पढना जारी रखे

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