चक्रा साउंड ध्‍यान–(कैसे करे)

ओशो चक्रा साउंड ध्‍यान—

भारतीय अध्‍यात्‍म जगत में जो भी खोज हुई है। वह अमुल्‍य है। ध्‍यानियों ने अपने अंतस में उतर कर संगीत, नृत्‍य, योग, और आर्युवेद, मुर्ति कला जाना है। जिसने हमारे जीवन के खजानें को इतना उन्‍नत और खुसहाल कर दिया था। इस तरह भारत ने संगीत की उन उच्‍चाईयों को जाना जिससे….ठाठ और राग निर्मित हुए। प्रत्‍येक राग का एक टाईम है…..उस किन—किन सुरों के साथ कितने समय पर गायन करना है।

यदि प्रकृति की दृष्‍टि से देखो तो इंद्रधनुष के साथ रंग दिखाई देंगे। इनमें लाल रंग पहला और बैंगनी रंग अंतिम होगा। बैंगनी रंग के बाद पून: यही क्रम दिखाई देगा। यह बात सोचने की है पढना जारी रखे

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फिर अमृत की बूंद पड़ी–(प्रवचन–02)

मैं जीवन सिखाता हूं—(प्रवचन—दूसरा)

      दिनांक 1 अगस्त 1986;

      प्रात: सुमिला, जुहू बंबई।

मैंने आज के लिए भेजे गए प्रश्न देखे; और उन्हें देखकर मुझे बड़ी शर्म आई। शर्म इस बात की कि भारत की प्रतिभा इतने नीचे गिर गई है कि यह कोई अर्थपूर्ण प्रश्न भी नहीं पूछ सकती। फिर अर्थपूर्ण उत्तरों की खोज करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। जो भी प्रश्न मुझे दिखाए गए वे सब सड़े गले हैं। पीली पत्रकारिता, जो तीसरे दर्जे की मनुष्यता की जरूरत पूरी करती है। उसमें मुझे कोई रस नहीं है। पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–15)

 पद घुंघरू बांध—(प्रवचन—पंद्रहवां)

हेरी! मैं तो दरद दिवानी

सूत्र:

 हेरी! मैं तो दरद दिवानी, मेरो दरद न जाणे कोइ।

घायल की गति घायल जाणे, की जिन लाई होइ।

जौहरि की गति जौहरि जाणे, की जिन जौहर होइ।

सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस विधि होइ।

गगन मंडल पे सेज पिया की, किस विधि मिलना होइ।

दरद की मारी बन बन डोलूं, बैद मिल्या नहिं कोइ।

मीरा के प्रभु पीर मिटेगी, जब बैद सांवलिया होइ। पढना जारी रखे

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फिर अमृत की बूंद पड़ी–(प्रवचन–01)

मैं स्वतंत्र आदमी हूं—(पहला—प्रवचन)

31 जुलाई 1986 प्रातः

सुमिला, जुहू बंबई

ड़े दुख भरे हृदय से मुझे आपको बताना है कि आज हमारे पास जो आदमी है, वह इस योग्य नहीं है कि उसके लिए लड़ा जाए।

टूटे हुए सपनों, ध्वस्त कल्पनाओं और बिखरी हुई आशाओं के साथ मैं वापस लौटा हूं। जो मैंने देखा वह एक वास्तविकता है, और अपने पूरे जीवन भर जो कुछ मैं मनुष्य के विषय में सोचता रहा, वह केवल उसका मुखौटा था। मैं आपको थोड़े से उदाहरण दूंगा, क्योंकि यदि मैं अपनी पूरी विश्व यात्रा का वर्णन सुनाने लगूं तो इसमें करीब-करीब एक माह लग जाएगा। इसलिए कुछ महत्वपूर्ण बातें ही आपसे कहूंगा, जो कुछ संकेत दे सकें। पढना जारी रखे

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फिर अमृत की बूंद पड़ी—ओशो

फिर अमृत की बूंद पड़ी—ओशो

(ओशो द्वारा मनाली ओर मुम्बई में दिये गये आठ अमृत प्रवचनो का संग्रह। जिसमें उन्होंने अमरीकी सरकार द्वारा दिये गये अत्याचारों की चर्चा है)

दुनिया में आज घोर निराशा की स्थिति है। एक ओर खाड़ी में बमों की बौछार हो

रही है जिसे कोई नहीं रोक पा रहा है। दूसरी ओर पूरे विश्व में आतंकवाद इतना आम है

कि रोजमर्रा की घटना हो गया है। ऐसे माहौल में अमृत की चर्चा अमृत की बूंदों की वर्षा

इस दुनिया की बात नहीं लगती है। नहीं लगता कि यह दुनिया रूपांतरित हो सकती है या

इसे कोई बदल कर अमृत-पथ की ओर ले जा सकता है। पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–14)

पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—चौदहवां)

समन्वय नहीं—साधना करो

प्रश्न—सार:

1—आप कहते हैं कि मनुष्य अपने लिए पूरी तरह जिम्मेवार है। और दूसरी ओर आप कहते हैं कि “समस्त‘ सब करता है। इन दो वक्तव्यों के बीच समन्वय कैसे हो?

 2—संसार में एक आप ही हैं जिससे भय नहीं लगता था। पर इधर कुछ दिनों से आपसे भय लगने लगा है। यह क्या स्थिति है, प्रभु?

 3—आपने कहा कि गीता के कृष्ण से मीरा का कोई संबंध नहीं। लेकिन मीरा तो कहती है मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। तो यह गिरधर गोपाल कौन है? पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–13)

पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—तेरहवां)

मीरा से पुकारना सीखो

सूत्र:

 सखी, मेरी नींद नसानी हो।

पिय को पंथ निहारत सिगरी, रैन विहानी हो।

सब सखियन मिलि सीख दई, मन एक न मानी हो।

बिन देख्या कल नांहि पड़त, जिय ऐसी ठानी हो।

अंगि—अंगि व्याकुल भई, मुख पिय—पिय बानी हो।

अंतर वेदन विरह की, वह पीड़ न जानी हो।

ज्यूं चातक घन कूं रटै, मछरी जिमि पानी हो।

मीरा व्याकुल विरहिणी, सुध—बुध बिसरानी हो। पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–12)

पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—बारहवां)

मनुष्य: अनखिला परमात्मा

 प्रश्न—सार:

 1—आपने कहा कि संसार से विमुख होते ही परमात्मा से सन्मुखता हो जाती है।

आखिर संसार कहां खत्म होता है और कहां परमात्मा शुरू होता है? इस रहस्य, पहेली पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।

2—आपने कहा—गदगद हो जाओ, तल्लीन हो जाओ, रसविभोर हो जाओ और जीवन को उत्सव ही उत्सव बना लो। लेकिन यह सब हो कैसे? मैं बड़ा निष्क्रिय सा अनुभव करता हूं। और अपने आप होश में कभी हुआ नहीं। बड़ी उलझन में हूं। कृपया समझाएं।

3—मनुष्य के जीवन में इतना द्वंद्व क्यों है?

4—सहस्रार की ऊंचाई पर खड़ी मीरा कहती है—”मेरो मन बड़ो हरामी’—तो हम मूलाधार की नीचाई पर खड़े लोगों के मन के लिए क्या कहा जाएगा?

5—मनुष्य की पात्रता कितनी है? पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–11)

पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—ग्यारहवां)

भक्ति: एक विराट प्यास

 सूत्र:

 म्हारो जनम—मरन को साथी, थानें नहिं बिसरूं दिन—राती।

तुम देख्यां बिन कल न पड़त है, जानत मेरी छाती।

ऊंची चढ़—चढ़ पंथ निहारूं, रोवै अखियां राती।

यो संसार सकल जग झूंठो, झूंठा कुल रा न्याती।

दोउ कर जोड़यां अरज करत हूं सुण लीजो मेरी बाती।

यो मन मेरो बड़ो हरामी, ज्यूं मदमातो हाथी।

सतगुरु हस्त धरयो सिर ऊपर, अंकुस दे समझाती।

पल—पल तेरा रूप निहारूं, हरि चरणां चित राती। पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–10)

पद घुंघरू बांध—(प्रवचन—दसवां) 

फूल खिलता है—अपनी निजता से

प्रश्न—सार

1—परंपरा में भी फूल खिलते हैं और परंपरा के कारण भी फूल खिलते हैं। व्यवस्था या परंपरा तो मिटेगी नहीं; इसलिए उसमें कभी—कभी जान डालनी पड़ती है।…?

2—मेरा मन न धन में लगता है न यश में लगता है, लेकिन मैं यह भी नहीं जानता हूं कि मेरा मन कहां लगेगा?…

3—मैं जो पा रहा हूं, उसे अपने प्रियजनों को भी देना चाहता हूं, लेकिन कोई लेने को तैयार नहीं।…?

4—आप जैसे महान दाता के होते हुए भी मेरा भिक्षापात्र क्यों नहीं भरता?… पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–09)

पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—नौवां)

राम नाम रस पीजै मनुआं

सूत्र:

 कोई कहियौ रे प्रभु आवन की, आवन की, मनभावन की।

आप न आवै लिख नहिं भेजै, बांण पड़ी ललचावन की।

ए दोइ नैन कह्यौ नहिं मानै, नदिया बहै जैसे सावन की।

कहा करूं कछु बस नहिं मेरो, पांख नहिं उड़ जावन की।

मीरा कहै प्रभु कब रे मिलोगे, चेरी भइ हूं तेरे दामन की। पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–08)

पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—आठवां )

दमन नहीं—ऊर्ध्वगमन

 प्रश्न—सार:

1—आमतौर से समझा जाता है कि धार्मिक बनने के लिए इंद्रियों को वश में रखना अनिवार्य है। आप कहते हैं कि इंद्रिय—दमन भक्ति का लक्षण नहीं।…?

2—कुछ दिनों से यहां प्रेम की ध्वनि सुन रहे थे, लेकिन आश्रम के वातावरण में वह कहीं भी सुनाई न पड़ती थी। वीणा के प्रत्युत्तर के बाद बाहर आनंद और प्रेम का अनोखा वातावरण छा गया। क्या कोई अपूर्व घटना घट गई या ये हमारी आंखों के गुण—दोष थे?

3—मैं आपके पास आया तो मेरी आंखें खुलीं, लेकिन तब से लोग मुझे अंधा कहने लगे।…?

4—“ललिता’ से “मीरा’ तक की यात्रा में साढ़े चार हजार साल का समय लग गया। भगवान, क्या प्रेम का मार्ग इतना ज्यादा कठिन और लंबा है? पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–07)

पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—सातवां)

मैंने राम रतन धन पायो

सूत्र:

 मैंने राम रतन धन पायो।

वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, करि करिपा अपनायो।

जनम—जनम की पूंजी पाई, जग में समय खोवायो।

खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन दिन बधत सवायो।

सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तरि आयो।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरखि—हरखि जस गायो।। पढना जारी रखे

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पद घूंघरू बांध–(प्रवचन–06)

पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—छठवां)

श्रद्धा है द्वार प्रभु का

 प्रश्न—सार:  

 1—श्रद्धा क्या है?

2—जाने क्या पिलाया तूने, बड़ा मजा आया!

3—प्रवचन में आपका प्यार बरस रहा है; उससे भी कहीं अधिक मार पड़ रही है। अब मार की तिलमिलाहट सहन नहीं होती।

4—स्मृति और स्वप्न से मैं आपके पास कभी—कभी पहुंच जाती हूं। लेकिन इस जन्म के पति की मेहरबानी से मैं अभी तक आप तक नहीं पहुंच पाई। आपकी प्रेम—दीवानी होने के लिए मैं क्या करूं?

5—यह कैसा विद्यापीठ है आपका, जहां सिखाया जाता है कि दो और दो चार होते हैं; और चार नहीं होते, पांच भी हो सकते हैं! पढना जारी रखे

पद घूंघरू बांध--(मीरा बाई) में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , | 4 टिप्पणियाँ

पद घुंघरू बांध–(प्रवचन–05)

      पद घुंघरू बांध—(प्रवचन—पांचवां)  

पद घुंघरू बांध मीरा नाची रे

सूत्र:

 माई री मैं तो लियो गोबिन्दो मोल।

कोई कहै छाने कोई कहै चौड़े लियो री वजंता ढोल।

कोई कहै मुंहगो कोई कहै सुंहगो लियो री तराजू तोल।

कोई कहै कारो कोई कहै गोरो, लियो री अमोलिक मोल।

याही कूं सब लोग जाणत हैं, लियो री आंखी खोल।

मीरा को प्रभु दरसण दीज्यो, पूरब जनम के कौल। पढना जारी रखे

पोनी--एक आत्‍म कथा में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

अमी झरत बि‍‍गसत कंवल–(प्रवचन–14)

अंतर जगत की फाग—(प्रवचन—चौदहवां)

दिनांक 25 मार्च, 1979;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्‍नसार:

1—आधुनिक मनुष्य की सब से बड़ी कठिनाई क्या है?

2—साधु—संतों को देखकर ही मुझे चिढ़ होती है और क्रोध आता है। मैं तो उन में सिवाय पाखंड के और कुछ भी नहीं देखता हूं, पर आपने न मालूम क्या कर दिया के श्रद्धा उमड़ती है! आपका प्रभाव का रहस्य क्या है?

3—भगवान! बुरे कामों के प्रति जागरण से बुरे काम छूट जाते हैं तो फिर अच्छे काम जैसे प्रेम, भक्ति के प्रति जागरण हो तो क्या होता है, कृपया इसे स्पष्ट करें।

4—भगवान! प्रभु—मिलन में वस्तुतः क्या होता है? पूछते डरता हूं। पर जिज्ञासा बिना पूछे मानती भी नहीं। भूल हो तो क्षमा करें। पढना जारी रखे

अमी झरत बिगसत कंवल—(दरिया) में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , | 2 टिप्पणियाँ

अमी झरत बिगसत कंवल—(प्रवचन—13)

अमी झरत, बिगसत कंवल—(प्रवचन—तेरहवां)

दिनांक 23 मार्च, 1979;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

      सारसूत्र:

नाम बिन भाव करम नहिं छूटै।।

साध संग औ राम भजन बिन, काल निरंतन लूटै।।

मल सेती जो मल को धोवै, सो माल कैसे छूटै।।

प्रेम का साबुन नाम का पानी, दोय मिल तांता टूटै।।

भेद अभेद भरम का भांडा, चौड़े पड़-पड़ फूटै।।

गुरमुख सब्द गहै उर अंतर, सकल भरम से छूटै।।

राम का ध्यान तूं धर रे प्रानी, अमृत का मेंह बूटै।।

जन दरियाव अरप दे आपा, जरा मरन तब टूटै।। पढना जारी रखे

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पद घूंघरू बांध–(प्रवचन–04)

मृत्यु का वरण: अमृत का स्वाद—(प्रवचन—चौथा)

 प्रश्न-सार

 1—प्रवचन सुनते समय भीतर ऐसी खलबली मच जाती है कि जिसका हिसाब नहीं।…क्या प्राण लेकर ही रहेंगे?

2—भक्ति के शास्त्र और भक्ति के गीत में क्या फर्क है?

3—क्या पुराने शास्त्र और उनकी सिखावन पर्याप्त नहीं?

4—कई संत-महात्मा कहते हैं कि मीरा कृष्ण के सगुण रूप से बंधी रही, इसलिए परमपद को प्राप्त न हो सकी।…?

5—मैं हार गया, तब भार गया। मैं झुक गया तो रुक गया। अब आप मिले, प्रभु साथ करें।

6—मैं जो पा रहा हूं, उसे बांटना चाहता हूं। लेकिन शब्द नहीं जुड़ते। मैं क्या करूं? पढना जारी रखे

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पद घूंघरू बांध–(प्रवचन–03)

मैं तो गिरधर के घर जाऊं—(प्रवचन—तीसरा)

 सूत्र:

मैं तो गिरधर के घर जाऊं।

गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।

रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं भोर भये उठि आऊं।

रैन-दिना बाके संग खेलूं ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊं।

जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।

मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।

जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं। पढना जारी रखे

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अमी झरत बिसगत कंवल–(प्रवचन–12)

नया मनुष्य—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक 22 मार्च, 1979;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्‍नसार:

1—भगवान! मेरे आंसू स्वीकार करें। जा रही हूं आपकी नगरी से। कैसे जा रही हूं, आप ही जान सकते हैं। मेरे जीवन में दुख ही दुख था। कब और कैसे क्या हो गया, जो मैं सोच भी नहीं सकती थी; अंदर बाहर खुशी के फव्वारे फूटे रहे हैं! आपने मेरी झोली अपनी खुशियों से भर दी है, मगर हृदय में गहन उदासी है और जाने का सोचकर तो सांस रुकने लगी हैं। आप हर पल मेरे रोम-रोम में समाए हुए हैं। मुझे बल दें कि जब तक आपका बुलावा नहीं आता, मैं आपसे दूर रह सकूं।

2—मैं परमात्मा को पाना चाहता हूं, क्या करना आवश्यक है? पढना जारी रखे

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पध घूंघरू बांध–(प्रवचन–02)

समाधि की अभिव्यक्तियां—(प्रवचन—दूसरा)

 प्रश्न-सार

1—न जाने वाली और आने-जाने वाली मस्ती क्या अलग-अलग हैं?

2—कभक्ति के मार्ग में साधु-संगति का इतना क्यों मूल्य है?

3—कई मनस्विद कहते हैं कि प्रेम मूलतः जैविक है, जो कि मनुष्य में दमन के कारण मानसिक हो जाता है।…?

4—भक्त की भाव-दशा के संबंध में कुछ कहें।

5—आप पूना पधारे, इसमें हमारी क्या पात्रता है? और आपके सामीप्य में मैं पूरा रूपांतरित नहीं हुआ, इसका पूरा का पूरा जिम्मा भी मेरा है। फिर भी जो आपने दिया है, वह बहुत है। मैं अनुगृहीत हूं।

6—क्या आप ईश्वर के होने का कोई प्रमाण दे सकते हैं? पढना जारी रखे

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अमी झरत बिगसत कंवल–(प्रवचन–11)

एक राम सारै सब काम—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

दिनांक 21 मार्च, 1979;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

सारसूत्र:

आदि अनादी मेरा सांई।

द्रष्टा न मुष्ट है अगम अगोचर, यह सब माया उनहीं माई।।

जो बनमाली सींचै मूल, सहजै पिवै डाल फल फूल।।

जो नरपति को गिरह बुलावै, सेना सकल सहज ही आवै।।

जो काई कर भान प्रकासै, तौ निस तारा सहजहि नासै।

गरुड़ पंख जो घर में लावै, सर्प जाति रहने नहिं पावै।।

दरिया सुमरै एक हि राम, एक राम सारै सब काम।।

आदि अंत मेरा है राम। उन बिन और सकल बेकाम।। पढना जारी रखे

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पद घूंघरू बांध–(प्रवचन–01)

प्रेम की झील में नौका-विहार—(प्रवचन—पहला)

सूत्र:

बसौ मेरे नैनन में नंदलाल।

मोहनी मूरत सांवरी सूरत, नैना बने बिसाल।

मोर मुकुट मकराकृति कुंडल, अरुण तिलक शोभे भाल।

अधर सुधारस मुरली राजति, उर वैजंति माल।

छुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर सबद रसाल।

मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बच्छल गोपाल। पढना जारी रखे

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पद घुंघरू बांध–(मीरा बाई)

 

(ओशो द्वारा मीरा बाई के पदों पर दिये गये बीस अमृत प्रवचनों का अमुल्‍य संकलन)

 प्रेम मीरा की इस झील में तुम्हें निमंत्रण देता हूं। मीरा नाव बन सकती है। मीरा के शब्द तुम्हें डूबने से बचा सकते हैं। उनके सहारे पर उस पार जा सकते हो।

मीरा तीर्थंकर है। उसका शास्त्र प्रेम का शास्त्र है। शायद शास्त्र कहना भी ठीक नहीं।

नारद ने भक्ति-सूत्र कहे; वह शास्त्र है। वहां तर्क है, व्यवस्था है, सूत्रबद्धता है। वहां भक्ति का दर्शन है।

मीरा स्वयं भक्ति है। इसलिए तुम रेखाबद्ध तर्क न पाओगे। रेखाबद्ध तर्क वहां नहीं है। वहां तो हृदय में कौंधती हुई बिजली है। जो अपने आशियाने जलाने को तैयार होंगे, उनका ही संबंध जुड़ पाएगा।

प्रेम से संबंध उन्हीं का जुड़ता है, जो सोच-विचार खोने को तैयार हों; जो सिर गंवाने को उत्सुक हों। उस मूल्य को जो नहीं चुका सकता, वह सोचे भक्ति के संबंध में, विचारे; लेकिन भक्त नहीं हो सकता। पढना जारी रखे

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अमी झरत बिगसत कंवल–(प्रवचन–10)

यह मशाल जलेगी—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 20 मार्च 1979, श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्‍नसार:

1—भगवान! आपने एक प्रवचन में कहा है कि भारत अपने आध्यात्मिक मूल्यों में गिरता जा रहा है। कृपया बताएं कि आगे कोई आशा की किरण नजर आती है?

2—भगवान! आज के प्रवचन में अणुव्रत की आपने बात की। मेरा जन्म उसी परिवार से है, जो आचार्य तुलसी का अनुयायी है। बचपन से ही आचार्य तुलसी के उपदेशों ने कभी हृदय को नहीं हुआ। अभी उन्होंने अपना उत्तराधिकारी आचार्य मुनि नथमल को आचार्य महाप्रज्ञ नाम देकर बनाया है। वे ठीक आपकी स्टाइल में प्रवचन देते हैं मगर उन्होंने भी कभी हृदय को नहीं छुआ। और आपके प्रथम प्रवचन को सुनते ही आपके चरणों में समर्पित होने का भाव पूरा हो गया और समर्पण कर दिया। पढना जारी रखे

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अमी झरत बिगसत कंवल–(प्रवचन–09)

मेरे सतगुर कला सिखाई—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 16 मार्च, 1079;

श्री रजनीश आश्रम, पूना

सारसूत्र:

जाके उर उपजी नहिं भाई। सो क्या जानै पीर पराई।।

ब्यावर जाने पीर की सार। बांझ सर क्या लखे बिकार।।

पतिव्रता पति को ब्रत जानै। बिभचारिन मिल कहा बखानै।।

हीरा पारख, जौहारि पावै। मूरख निरख के कहा बतावै।।

लागा घाव कराहै सोई। कोतगहार के दर्द न कोई।।

रामनाम मेरा प्रान—अधार। सोइ रामरस—पीवनहार।।

जन दरिया जानेगा सोई। प्रेम की भाल कलेजे पोई।।

जो धुनियां तौ मैं भी राम तुम्हारा। पढना जारी रखे

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